दिल्ली से खीरगंगा की ट्रैकिंग

यात्रा तिथि – 24, 25, 26 जून 2017, जगह – दिल्ली से खीरगंगा. साधन – पब्लिक ट्रांसपोर्ट, खर्चा – 3500 प्रति व्यक्ति

मेरा नाम संगम मिश्रा है, वैसे मैं रहने वाला यूपी के गोरखपुर से हूं लेकिन काफी समय से दिल्ली में रह रहा हूं, अब तक मैंने बाइक से बहुत सी यात्राएं की हुई है जिसमे उत्तराखंड, हिमांचल, जम्मू कश्मीर, लद्दाख, राजस्थान, यूपी, नेपाल आदि शामिल है लेकिन ये यात्रा मैंने बस से की थी जो आप लोगो के सामने रख रहा हूँ।

जून 2017 का महीना था, मैं और मेरे कुछ दोस्त काफी समय से कहीं ट्रैकिंग पर जाने का विचार कर रहे थे लेकिन जाने का समय और स्थान निश्चित नहीं हो पा रहा था। इससे पहले मैंने कभी ट्रैकिंग नहीं की थी, हां बाइक के साथ छोटी मोटी ट्रैकिंग जरूर की थी लेकिन उसे ट्रैकिंग नहीं कहा जा सकता।

इस बार घूमने जाने के लिए 2-3 ट्रेक मेरे दिमाग मे थे और उसी में से काफी सोच विचार करने के बाद हमने त्रिउंड की ट्रैक पर जाने का निश्चय किया लेकिन त्रिउंड का ट्रेक छोटा होने के कारण बाद में हमने खीरगंगा ट्रैक करने का सोचा।

जून के अंतिम हफ्ते में शुक्रवार की रात, हम तीनो लोग ऑफिस से अपना काम निपटा कर खीरगंगा ट्रैक के लिए आईएसबीटी कश्मीरी गेट बस अड्डे पर पहुंचे, क्योंकि यह एक ट्रेकिंग थी इसलिए हमने बस से जाने का निश्चय किया, कारण यह था कि अगर हम बाइक से जाते तो 2 दिन हमे आने जाने में लग जाता जबकी समय का हमारे पास कमी थी और दूसरा बाइक को दो-तीन दिन कहीं खड़ा करने की दिक्कत आती तो हमने सोचा कि क्यो ना बस अड्डे से वॉल्वो या हिमाचल गवर्नमेंट की सेमी स्लीपर बस पकड़ कर चला जाये, लेकिन होनी को तो कुछ और ही मंजूर था, 3 दिन की लंबी सप्ताहांत छुट्टी होने के कारण बस अड्डे पर बहुत भीड़ थी और उसकी वजह से मनाली जाने वाली सारी बसें पहले से ही भरी हुई थी।

बहुत मुश्किल से हमने दिल्ली से मनाली जाने वाली साधारण बस में भुन्तर के लिए तीन टिकट 600 रुपये एक टिकट के हिसाब से लिया और बस के खुलने की प्रतीक्षा करने लगे। बस को खुलने में अभी काफी समय था इसलिए हमने सोचा कि क्यो ना कुछ खाने पीने का समान खरीद लेते हैं जो रास्ते में काम आएगा इसलिए हेमंत को वही बस में बैठा कर मैं और सुखविंदर बस अड्डे के बाहर आकर कुछ खाने की चीजें खरीदने लगे। जब समान लेकर हम वापस अंदर आने लगे कि तभी अचानक सुखविंदर ने मुझसे बोला कि “भाई कांड हो गया” और पूछने पर बताया कि उसका बटुआ गायब है।

खैर हम लोग वापिस बस अड्डे के बाहर निकले और इधर-उधर देखने लगे कि फिर सुखविंदर ने बोला कि भाई बटुआ मिल गया, बाद में पता चला कि उसने बटुए को बैग में डाल दिया था और पेन्ट की जेब में खोज रहा था।

थोड़ी देर बाद हम लोग वापिस बस में आए और कंडक्टर से बात करके अपनी सीटें एकदम पीछे वाली लाइन में दरवाजे के पास करवा लिया जिससे बैठने पर पैर को सीधा करने के लिए थोड़ी सी जगह मिल जाए।

बस अपने निर्धारित समय रात के 9 बजे, कश्मीरी गेट बस अड्डे से मनाली के लिए निकली, रास्ते में अंबाला से थोड़ा पहले बस एक ढाबे पर खाने के लिए रुकी, हेमंत अपने घर से परांठे और सब्जी बनवाकर लाया था, तो हमने वही पर परांठे खाये और बस में सोने की कोशिश करने लगे।

थोड़ी देर बाद बस वहाँ से चली और फिर चंडीगढ़ बस अड्डे पर जा कर रुकी, थोड़ी देर तक बस में सवारियों को उतारने और चढ़ाने के बाद बस मनाली के लिए चल दी।

हमलोग सोने की बहुत कोशिश कर रहे थे लेकिन नींद आने का नाम ही नही ले रही थी, लेकिन जब रात के 2 बज गए उसके बाद तो बैठे बैठे कब नींद आयी पता ही नही चला और हम तीनों अपनी सीट पर सो गए।

सुबह-सुबह की पहली लालिमा के साथ बस एक जगह रास्ते मे फिर रुकी और हमने ब्रश करके चाय पिया जिसके बाद बस आगे की तरफ चल पड़ी।

पहला दिन -1

सुबह के 8:00 बजे हम लोग दिल्ली से मनाली जाने वाली बस से भुंतर में उतरे, भुंतर जोकि एक छोटा सा पर्वतीय शहर है और कुल्लू से करीब 20-25 किलोमीटर पहले आता है, साथ ही यहाँ पर एक हवाई अड्डा भी है। यहाँ से एक सीधा रास्ता मनाली की तरफ जाता है, और दायें हाथ को एक सड़क कटती है जो कसोल, मनिकरण होते हुए बरसैनी को जाती है। 10-11 घंटे की बस में यात्रा करने के कारण हमारे हाथों-पैरों के साथ-साथ पूरा शरीर एकदम जकड़ सा गया था कि तभी, सामने से मनीकरण जाने वाली बस आती दिखी। हमने तुरंत ही आगे बढ़ कर बस को रोका और उसमे सवार हो गए

लोकल बस

बस वहां के लोकल सवारियों से एकदम भरी हुई थी, खैर किसी तरह से हमने बस में खड़ा होने की जगह बनाई और मनीकरण के लिए चल दिए। थोड़ी देर बाद बस का कंडक्टर आया और उसने भुंतर से मनीकरण का ₹50 प्रति व्यक्ति का टिकट दिया। भुंतर से मनीकरण का रास्ता बहुत ही मनमोहक और लुभावना है लेकिन कुछ जगहों पर बहुत ही खतरनाक सा दिखता है। कुछ जगह तो ऐसी हैं जैसे लगता है कि ऊपर से पहाड़ कभी भी गिर सकता है और इसे लैंडस्लाइड जोन का नाम दिया गया है साथ जगह-जगह पर लोगो की जानकारी के लिए बोर्ड भी लगाए हुए है।

बस अपनी मध्यम गति से पहाड़ो के टेढ़े- मेढ़े रास्तो पर हिचकोलिया लेते हुए आगे बढ़ने लगी। बीच-बीच मे ट्रैफिक जाम के कारण बस अपनी निर्धारित गति नही बना पाए रही थी और हमलोगों को जाम में खड़ी बस में से उतरकर थोड़ा बहुत घूमने का मौका भी मिल जा रहा था।

थोड़ी देर बाद हम लोग कसोल पहुंचे और वहां पर करीब 5 किलोमीटर का लंबा जाम लगा हुआ था। हमारा कसोल में घूमने का कोई प्लान नहीं था लेकिन कहते हैं कि “बिल्ली के भाग्य से छींका टूटा” वाली कहावत हुई और हमने सोचा कि इस जाम में कम से कम दो-तीन घंटे तो लग ही जाने हैं तो क्यों ना तब तक कसोल में घूम लिया जाए। हमने हेमंत राज को बस में ही बैठने को बोला और फिर मैं, सुखविंदर के साथ कसोल में घूमने के लिए निकल गए। थोड़ी देर तक इधर उधर घूमते-घूमते हम लोग पार्वती नदी के किनारे पहुंचे और फिर किनारे-किनारे आगे बढ़ने लगे। नदी का पानी पत्थरो से टकराकर आगे बढ़ रहा था और उस टकराहट से पानी की छोटी छोटी बूंदे जो एकदम ठंडी थी वो हमारे शरीर पर पड़ रही थी औऱ इस गर्मी में हमारे तन-मन को शीतल कर रही थी।

अचानक सुखविंदर को एक पौधा बहुत अच्छा सा देखने में लगा और जैसे ही उसने उस पौधे के साथ बैठकर फ़ोटो खिंचाने के लिए पकड़ा कि एक बिच्छू सा तेज डंक उसके हाथों में लगा। वह कोई जंगली प्रजाति का पौधा था जिसमे छोटे-छोटे कांटे लगे थे जिससे उसके हाथों में बहुत तेज दर्द होने लगा, लेकिन जब उसने हाथ को नदी के ठंडे पानी से धोया तो उसे तुरंत ही आराम मिल गया।

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पार्वती नदी कसोल

थोड़ी देर और इधर-उधर घूमने के बाद हम वापिस मुख्य सड़क पर आये, बस भी करीब-करीब जाम से बाहर निकलने ही वाली थी। हम लोग तुरंत बस में चढ़े और बस मनीकरण की तरफ बढ़ चली।

कसोल से मनीकरण की दूरी करीबन 6 किलोमीटर के आसपास है लेकिन सड़क पर ट्रैफिक ज्यादा होने के कारण बस बहुत धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी, मनीकरण से 1 किलोमीटर पहले फिर हमारा जाम से सामना हुआ और वहाँ से पुलिसवालों ने बस को आगे जाने से रोक दिया, हम लोग भी बस से उतरकर पैदल ही मनीकरण की तरफ बढ़ लिए।

थोड़ी देर बाद हम लोग मनीकरण पहुंचे और सीधे ही गुरुद्वारे में जाकर मत्था टेका, लंगर खाया और साथ ही थोड़ी देर आस-पास की जगहों पर घूमने लगे। कुछ समय मनिकरण में व्यतीत करने के बाद हम वापस बस स्टैंड पर आ गए।

मनीकरण

यहां आने पर पता चला कि जो बस भुंतर से बरसैनी जाती है वह जाम होने के कारण बंद है, इसलिए हमें मनिकरण से बरसैनी की कोई भी बस नही मिल सकती। हमने टैक्सी के बारे में पता किया तो एक टैक्सी वाला ₹500 में बरसैनी जाने को तैयार हुआ कि तभी एक शेयर टैक्सी आयी और सौ रुपए प्रति सवारी ले जाने को तैयार हो गयी, हम लोग तुरंत ही शेयर टैक्सी में चढ़ लिए और 10 मिनट में सारी सवारियां भर जाने के बाद, टैक्सी बरसैनी की तरफ रवाना होने लगी। मनीकरण से बरसैनी करीब 15-16 किलोमीटर है जो उस टैक्सी वाले ने 40 मिनट में पहुंचा दिया।

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बरसैनी

हमारे पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के मुताबिक, शनिवार की रात हमें तोश विलेज में गुजारनी थी जोकि बरसैनी से करीब-करीब 4 किलोमीटर दूर है। तोश विलेज अपनी प्रकीर्तिक सुंदरता के लिए जाना जाता है, वहां पर जाने के दो साधन है, या तो आप पैदल जाएं या बरसैनी से ही कोई टैक्सी किराये पर बुक कर ले जो ₹200 में तोश विलेज पहुंचा देगी। हम तीनों ठहरे मनमौजी, इसलिए हमने पैदल ही जाने का निश्चय किया, क्योंकि पैदल जाने पर आप रास्ते का पूरा मजा लेते हुए जा सकते है। बरसैनी में थोड़ा सा चाय नाश्ता करके हम तीनों पैदल ही तोश विलेज की तरफ चल दिये। रास्ते की खूबसूरती को निहारते हुये करीब 1:30 से 2 घंटे में हम तीनो तोश विलेज पहुंचे। थोड़ी देर तक हमने तोश विलेज में घूमा लेकिन हमें कुछ खास जमा नहीं, इसलिए रात तोश विलेज में रुकने का कार्यक्रम हमने रदद् कर दिया और वापस बरसैनी की तरफ़ चल दिये। हमने सोचा कि आज बरसैनी में जाकर रुक जाते हैं जिससे कल सुबह सुबह खीर गंगा के लिए समय से निकल जाएंगे। करीब घंटा भर भी नहीं लगा कि हम बरसैनी वापस आ गए क्योंकि पहाड़ों पर उतारना चढ़ने के मुकाबले कम समय लेता है।

तोश विलेज

तोश विलेज

शाम के 4:00 बज रहे थे और हम बरसैनी में वापस खड़े थे, फिर हमने सोचा कि क्यों ना बरसैनी में रुकने की बजाय हम खीरगंगा की तरफ आगे बढ़ें, वहां के स्थानीय लोगों ने बताया कि अगर आप अभी खीरगंगा के लिए निकल जाओ तो 5 किलोमीटर आगे एक गांव है नकथान, वहाँ दिन डूबने तक आराम से पहुँच जाओगे और फिर आज की रात आप उस गांव में गुजार लेना और अगले दिन सुबह सुबह खीरगंगा के लिए निकल जाना। बरसैनी से खीरगंगा ट्रेक की लंबाई करीब 14 किलोमीटर है और अगर यह 5 किलोमीटर कि ट्रैकिंग हम आज कर लेते हैं तो कल हमें कम चलना पड़ेगा, यही सोचकर हमे भी यह सुझाव अच्छा लगा और थोड़ा सा चाय नाश्ता करने के बाद हम लोग नकथान गांव के लिए निकल पड़े। रास्ता बहुत ही पतला, पथरीला और उबड़-खाबड़ था, साथ ही कही-कही एकदम खड़ी चढ़ाई थी जिससे हमारे जैसे नए लोगों के लिए ये छोटी सी पहाड़ी यात्रा भी काफी मुश्किल लग रही थी। खैर धीमे-धीमे हम लोग प्रकृति के सुंदर नजारों का मजा लेते हुए सधे कदमों से आगे बढ़ते गए।

पार्वती नदी

खीरगंगा ट्रेक

पहाड़ी घर

खीरगंगा ट्रेक

थोड़ी देर बाद अंधेरा होने लगा लेकिन नकथान गांव का कही अता-पता नही दिख रहा था। पूछते-पूछते रात के 8 बजे हम नकथान गांव में पहुँचे और रात के रुकने के लिए कमरे की तलाश शुरू कर दिए। नकथान गांव में रुकने की ठीक ठाक व्यवस्था है और हर बजट के हिसाब से वहाँ पर आसानी से कमरा मिल जाता है। हमने भी एक कमरा जो कि ₹600 का था उसे ले लिया और अंदर जाते ही बिस्तर पर गिर पड़े। 3 किलोमीटर कसोल और मनिकरण में पैदल चले, 8 किलोमीटर का तोश विलेज का आना-जाना और 5 किलोमीटर नकथान गांव की ट्रैकिंग हमने कर लिया था जिसकी वजह से हमारा शरीर थक कर चूर-चूर हो गया था। थोड़ी देर आराम करने के बाद मैं नहाने के लिए बाथरूम में गया और जैसे ही शरीर पर पानी की पहली बौछार शावर से पड़ी, मुझे लगा कि मेरा पूरा शरीर एकदम सुन्न सा हो गया है क्योंकि पानी एकदम ठंडा था। किसी तरह नहा कर मैं बाहर आया तो होटल का मालिक वहीं पर खड़ा था। मैंने उसको बोला कि पानी बहुत ठंडा है तो उसने बोला, सर आप मुझे बोल दिये होते तो मैं गीजर चालू कर देता, मैं मन-ही-मन अपने आप को गालियां देते हुए यह सोचने लगा की एक बार अगर बाथरूम को देख लेता तो गर्म पानी से मस्त होकर नहाता और शरीर की सारी थकान दूर हो जाती। खैर मेरे बाद हेमंत और सुखविंदर मस्त गर्म पानी से नहा कर आए और उसके बाद हम लोग बाहर खाना खाने के लिए चले गए। रात में हमने बाहर रेस्टोरेंट में डिनर किया और जब वापस आए तो होटल का रास्ता भूल गए। पहाड़ी गांवो में सारे घर एक ही तरीके के बने होते हैं और ऊपर से रात में बिल्कुल ही अंधेरा छाया हुआ था जिसकी वजह से हम उस होटल या होमस्टे कहे, उसका का रास्ता भूल कर चुकें थे। हमने कुछ लोगो से रास्ता पूछने की कोशिश की लेकिन होटल का नाम हमे पता नही था इसलिए कोई भी सहायता नही कर पा रहा था। किसी तरह से मोबाइल के टॉर्च की रोशनी में खोजते हुए हम होटल के कमरे तक आखिरकार पहुँच ही गये।

थोड़ी देर बाद हेमंत बोला कि उसे बहुत तेजी से सरदर्द हो रहा है और जी मिचला रहा है, लग रहा है जैसे AMS हो गया है, और बोला कि तुम लोग कल खीरगंगा चले जाओ, मैं यहीं रुक जाता हूं और जब वापिस आओगे तो मैं यही मिल जाऊंगा। हमने हेमंत को समझाया कि ऐसा कुछ नहीं है और इतनी कम ऊँचाई पर AMS नही होता लेकिन वो लेकिन वह आगे जाने के लिए मना करने लगा। फिर मैंने अपने शब्दों वाले तरकश से अंतिम बाण चलाया कि अगर खीरगंगा जाएंगे तो सब जाएंगे नही तो यही से वापस घूम जाएंगे। यह बाण सीधे ही निशाने पर लगा और अंततः हेमंत सुबह खीरगंगा जाने के लिए तैयार हो गया और हम लोग आपस मे बातचीत करते हुए बिस्तर में मस्त होकर सो गए और इस तरह खीरगंगा ट्रेक का हमारा पहला दिन समाप्त हुआ।

दूसरा दिन 2

अगले दिन सुबह के 7:00 बजे हम लोग उठे और नहा धोकर 8:00 बजे खीरगंगा के लिए चल दिए, खीरगंगा यहां से करीब 8-9 किलोमीटर था।

एक पतले से पगडंडी नुमा रास्ते पर पहाड़ की खूबसूरती को निहारे हुए हम लोग आगे बढ़ने लगे। हमारे दोनों तरफ सेब के काफी सारे पेड़ थे जिस पर हरे-हरे कच्चे सेब के फल लगे हुए थे, साथ ही रास्ते में जगह-जगह छोटे बड़े पानी के झरने भी मिल रहे थे जिससे रास्ते की खूबसूरती और बढ़ रही थी।

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खीरगंगा कि तरफ

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सेब का पेड़

थोड़ी देर चलने के बाद हम लोग खीरगंगा ट्रैक के बीचों बीच में स्थित सबसे बड़े झरने रुद्रनाग पहुँचे। रुद्रनाग झरने के पास काफी सारी भीड़ लगी हुई थी जहाँ पर सारे लोग खड़े होकर फ़ोटो खींच रहे थे साथ ही झरने की वीडियो भी बना रहे थे। रुद्रनाग के झरने पर एक छोटा सा लोहे का पुल बना हुआ है जिस पर खड़े होकर हमलोगों ने भी कुछ फोटो और वीडियो लिए, झरने के पानी की गर्जना बहुत तेज़ थी और उसके वेग से लोहे का पुल भी हल्का हल्का काँप रहा था, साथ ही पानी की छोटी-छोटी छीटे हमारे ऊपर भी पड़ रही थी जिससे वहाँ का माहौल एकदम रूमानी सा हो गया था कि तभी हमे उसके साथ एक और बहुत ही खूबसूरत सा झरना दिखा। हम तीनों उस झरने को देखकर एकदम मोहित से हो गए लेकिन ये सम्मोहन ज्यादा देर तक नही चला क्योंकि हमें खीरगंगा की सबसे कठिन चढ़ाई अभी करनी थी। थोड़ी देर तक प्रकृति के सुंदर नजारे का आनंद लेने के बाद, हमने वही के एक ढाबे पर चाय और परांठे का ऑर्डर दे दिया और थोड़ी देर आराम करने के लिए बैठ गए। थोड़ी देर में चाय, परांठे बन कर आ गए और हम लोगों ने नाश्ता किया और फिर आगे की चढ़ाई पर निकल गए।

रुद्रनाग के बाद रास्ते की चढ़ाई थोड़ी कठिन हो जाती है। गर्मी का मौसम होने के बावजूद रास्ते भर चारों तरफ हरियाली फैली हुई थी और ऐसा लग रहा था जैसे प्रकृति ने खुद ही अपनी पलके बिछा रखी हो।रास्ते मे चहल-पहल भी खूब थी और काफी लोग आ या जा रहे थे। खीरगंगा ट्रैक वैसे तो ज्यादा कठिन नहीं है लेकिन रास्ता करीब 14 किलोमीटर लंबा है और बीच-बीच में कहीं-कहीं खड़ी चढ़ाई भी है। कही कही रास्ता बिल्कुल ही पहाड़ की धार पर है जिस पर फिसलन होने के कारण हमें आगे बढ़ने में काफी मुश्किल हो रही थी, और रास्ता भी ऐसा कि एक गलत कदम हमे रास्ते से हजारों फुट नीचे बहती पार्वती नदी में पहुँचा सकता था। पहाड़ो पर चढ़ने के मुकाबले उतरना ज्यादा मुश्किल होता है उसका उदाहरण हमे एक जगह देखने को मिला, एक लड़का जो कि खीरगंगा से नीचे उतर रहा था वह अपने कदमो पर नियंत्रण नही कर पाया और दौड़ने की रफ्तार से नीचे जाने लगा, उसका मोबाइल और बैग हमलोगों के सामने ही छटक कर गिर गया और हम उसे रोकने की कोशिश भी किए लेकिन पैरो पर नियंत्रण ना होने के कारण वो खाई की तरफ गिरने ही वाला था कि रास्ते मे एक भले मानुष ने उसके पैरों में एक डंडा फ़सा दिया। डंडे ने उसकी रफ्तार को रोक दिया और वह धड़ाम से रास्ते पर गिर गया जिससे उसे थोड़ी चोट तो आयी लेकिन उसकी जान बच गयी। खैर हमलोग धीरे-धीरे रास्ते भर में बन आये छोटे बड़े झरनों का आनंद उठाते हुए चार-पांच घंटे में खीरगंगा पहुंच गए और एक ढाबे वाले के पास रात में रहने के लिए ₹500 में 3 लोगों वाला एक टेंट किराए पर लिया।

क्योंकि सुबह हम लोग रुद्रनाथ से 1 परांठे और चाय पी कर आगे बढ़े थे, इसलिए भूख भी जोरों की लगी हुई थी अतः टेंट वाले के ढाबे पर चाय और मैगी खाए और थोड़ी देर टेंट में आकर आराम करने लगे।

खीरगंगा पहाड़ो के बीच में एक खुला सा मैदान है जिसके ऊपर की तरफ एक मंदिर भी है और उसके साथ ही एक गर्म पानी का कुंड है जिसमे पहाड़ से निकलकर हमेशा गर्म पानी गिरता रहता है, लोग कहते हैं कि उस गर्म पानी में नहा लेने से कई चर्म रोगों से मुक्ति मिल जाती है। उस खीरगंगा कुंड के पानी में सफेद सफेद सा खीर की तरह कुछ रहता है जिसकी वजह से उसे खीरगंगा कहा जाता है।

हम लोग भी थोड़ा सा आराम करने के बाद खीरगंगा के कुंड में नहाने के लिए चले गए, कुंड का पानी काफी गर्म था, थोड़ी देर हम लोग उस पानी में हाथ और पैर डालकर बैठे रहे जिससे शरीर धीरे-धीरे उस गर्म पानी का आदी हो गया और उसके बाद 10 मिनट तक हमने उस गर्म पानी के कुंड में नहाया। नहाने के बाद जैसे ही हम लोग बाहर निकले हमें लगा कि पूरे दिन की थकावट एकदम खत्म सी हो गई है और हम एकदम फ्रेश महसूस करने लगे।

“मुझे भी हर साल गर्मियों में हाथों और पैरों में बहुत खुजली होती थी, बहुत ही इसका इलाज करवाया लेकिन कोई फायदा नही हुआ लेकिन खीरगंगा के उस पानी मे 10 मिनट हाथ और पैर डाल कर बैठने से 90% खुजली सही हो गयी।”

नहा कर हम वापस टेंट में आ गए वहां और भी लोग देश के कई शहरों से आए हुए थे। हम लोग आपस में मिलकर बातचीत करने लगे और एक दूसरे के साथ अपनी अपनी जानकारियां बांटने लगे। जैसे-जैसे शाम हो रही थी मौसम का एक अलग ही रंग दिख रहा था, हम लोग टेंट से बाहर निकल कर आए और वहां पर घूमने के साथ-साथ फोटो भी खींचने लगे। थोड़ी देर बाद मौसम अचानक एकदम ठंडा सा हो गया और हम लोग वापस टेंट में चले आए और ढाबे वाले को खाने में राजमा चावल का बोल दिया। थोड़ी देर बाद जब खाना तैयार हो गया तो हम लोग टेंट से बाहर आए और उसके डाइनिंग एरिया में बैठकर खाना खाया और खाना खा कर फिर वापस टेंट में आ कर सोने लगे। हेमंत और सुखविंदर को तो मस्त नींद आ गई और वह सो भी गए लेकिन मुझे नींद नहीं आ रही थी। रात के करीब 12:30 बजे के आसपास मैं अपने टेंट से बाहर निकला और बाहर एक कुर्सी पर बैठकर मौसम का आनंद उठाने लगा। बैठे बैठे रात के 2:00 बज गए लेकिन मुझे नींद आने का नाम नहीं ले रही थी कि तभी, बादल गड़गड़ाने लगे और बारिश होने लगी। मैं तुरंत ही भाग कर अपने टेंट में वापस आया और फिर सोने की कोशिश करने लगा। बारिश रात भर होती रही जिसे हम अपने टेंट के अंदर से महसूस कर रहे थे। खैर किसी तरह से मुझे भी नींद आ गई और मैं भी सो गया।

तीसरा और अंतिम दिन

आज हमारा तीसरा दिन था और हमें खीरगंगा से वापस भुंतर पहुंचना था और फिर वहां से दिल्ली के लिए बस पकड़नी थी इसलिए सुबह के 8 बजे हम लोग तैयार होकर बरसैनी की तरफ चल दिए। चढ़ने के मुकाबले उतरने में समय कम लगता है लेकिन उतरते समय पैरो की गति के ऊपर बहुत ज्यादा ध्यान देना पड़ता है जिससे शरीर का मूवमेंट ज्यादा तेज ना हो।

बरसैनी से खीरगंगा जाने या आने के लिए 2 रास्ते है, पहला जो कि नकथान गांव से होकर जाता है जहाँ रास्ते मे आपको खाने-पीने की चीज़ें मिलती रहती है, साथ ही रास्ता काफी चलता हुआ है इसलिए कोई दिक्कत होने पर मदद भी आसानी से मिल जाती है। दूसरा रास्ता कलगा, पुलगा होते हुए जाता है जो की बहुत ही खूबसूरत रास्ता है, लेकिन बहुत ही सुनसान है। इस रास्ते पर आपको कोई भी मदद नहीं मिल सकती। चूँकि कल रात बारिश हुई थी इसलिए हमने नकथान गांव वाला रास्ता ही चुना और बरसैनी की तरफ चल दिये। थोड़ी देर में हम लोग रुद्रनाग पहुँचे और कल वाले ढाबे पर ही रुक कर नाश्ता किया उसके बाद आगे की तरफ बढ़ने लगे। दोपहर के 12:00 बजे हम लोग बरसैनी पहुँचे और वहां से भुंतर जाने के लिए बस का इंतजार करने लगे। थोड़ी देर बाद पता चला कि जाम लगा होने के कारण आज भी बरसैनी की तरफ आने वाली सारी बसें मनीकरण पर रोक दी गयी हैं इसलिए बरसैनी से भुंतर या मनिकरण की कोई भी बस नही मिल सकती।

फिर हमने शेयर टैक्सी खोजना शुरू किया तो पता चला कि जगह-जगह जाम होने के कारण यहां से शेयर टैक्सी भी नही मिल पाएगी और हमे कैब बुक करके ही मनीकरण जाना होगा। कोई और रास्ता ना होने के कारण हम ₹500 में बरसैनी से मनीकरण के लिए कैब किराये पर लेकर चल दिये।

मनीकरण से 5 किलोमीटर पहले एक गाड़ी काफी गहरी खाई में जा गिरी थी और सड़क के बीचो-बीच एक क्रेन खड़ी होकर उस कार को निकालने की कोशिश कर रही थी जिसकी वजह से दोनों तरफ काफी लंबा जाम लगा हुआ था। थोड़ी देर इंतजार करने के बाद जब जाम नहीं खुला तब हमने कैब को वहीं पर छोड़ दिया और पैदल ही मनीकरण की तरफ चल दिये जो कि वहां से 5 किलोमीटर दूर था। 14 किलोमीटर पैदल खीरगंगा से उतरने के कारण थकावट खूब हो रखी थी ऊपर से 5 किलोमीटर का और रास्ता पैदल तय करना था। थोड़ी देर चलने के बाद बरसैनी की तरफ से गाड़ियां आनी शुरू हो गई जिससे पता चला कि जाम खुल गया है, लेकिन हम अपनी कैब छोड़ चुके थे और वह कैब वही से वापस जा चुकी थी। हेमंत मुझे और सुखविंदर को खूब कोस रहा था लेकिन हम लोग उसके साथ मजे लेते और चिढ़ाते हुए मनिकरण की तरफ बढ़ने लगे। पैदल चलने के कारण बीच बीच में हमलोग शॉर्टकट पकड़ कर आगे बढ़ने लगे और थोड़ी ही देर में हम लोग मनिकरण पहुंचे गये। जैसे ही हम बस अड्डे पर पहुँचे उसी समय एक बस मनिकरण से भुंतर के लिए निकल रही थी। हम लोग दौड़कर उस बस में चढ़े और एक खाली पड़ी सीट पर बैठ गए। शाम के 6:00 बजे के आसपास हम लोग भुंतर से थोड़ा पहले ही थे कि फिर जाम से सामना हुआ औऱ बस वाले ने बोला कि अब इस जाम में बस आगे नही जाएगी तो जिसको भुंतर बस अड्डे पर जाना है वह यही उतर जाए। मरता क्या ना करता, हम भी वही उतर गए और एक दुकानदार से भुंतर बस अड्डे के लिए पूछा तो पता चला की 4 किलोमीटर है। खैर फिर हम तीनों पैदल ही बस अड्डे की तरफ चल दिये। शाम का समय होने के कारण हर तरफ बाज़ारो में खूब रौनक थी, थोड़ी ही देर में हम भुंतर में पार्वती नदी के ऊपर बने पुल पर पहुँच गये जहाँ से एक तरफ सूर्यास्त का बहुत ही सुंदर नजारा दिख रहा था तो दूसरी तरफ पार्वती नदी में कुछ लोग रिवर राफ्टिंग कर रहे थे। थोड़ी देर उस पुल पर खड़े होकर हमने इन प्राकृतिक नजारों का आनंद लिया और फिर बस अड्डे की तरफ चल दिए।

रास्ता चढाई वाला न होकर समतल ही था इसलिए थोड़ी ही देर में हम भुंतर के बस अड्डे पर पहुँचे और कौन सी बस पकड़ी जाए इसके बारे में विचार करने लगे। सुबह से हम तीनों करीब 23 किलोमीटर तक चल चुके थे, जिसकी वजह से थकावट अपनी चरम सीमा तक पहुँच गयी थी इसलिए साधारण बस से दिल्ली तक जाने की हिम्मत हमारे पास नहीं थी, तो हमने सोचा कि क्यों ना वोल्वो बस को पकड़ा जाए जिससे आराम से सोते हुए कल सुबह दिल्ली पहुँच जायँगे और ऑफिस भी नही छूटेगा। बस की टिकट के बारे में थोड़ी देर पता कहने के बाद एक सरदार जी मिले जिनकी भुंतर चौराहे पर ही मिठाइयों की दुकान है और साथ ही टूर ट्रेवल का भी काम करते हैं। उनसे टिकट के बारे में बातचीत करने के बाद1500 रुपये एक टिकट का किराया बताया लेकिन जब मैंने थोड़ा सा मोल-भाव किया तो 1200 रुपये टिकट के हिसाब से तैयार हो गए।हमने भी तुरंत ही 3 सीटें बुक करवा लिया। रात के 10 बजे हमारी बस जो मनाली से चली थी भुंतर पहुंची और हम लोग बस में जाकर बैठ गए। आधा घंटा भुंतर में रुकने के बाद बस दिल्ली के लिए चल दी। रात में 1 बजे के आस-पास बस एक ढाबे पर खाने के लिए रुकी, भूख तो हमे थी नही लेकिन हम लोग भी नीचे उतरकर थोड़ा सा कुछ खा लिए और वापस आकर सो गये।दिन भर पैदल चल होने के कारण, बस में खूब मस्त नींद आयी और सुबह के करीब 8 बजे सोकर उठे, बस दिल्ली चंडीगढ़ हाइवे पर कही थी। थोड़ी देर बाद हम फिर सो गये और फिर जब बस कुंडली बॉर्डर पर पहुँची तब हमारी नींद खुली। दिल्ली में बाहर की बसों का चालान काटा जा रहा था जिसकी वजह से बस वाले ने हमे कुंडली मे ही उतार दिया और वहां से हम एक दूसरी मेट्रो की फीडर बस में बैठा दिया और वह बस हमे जहांगीरपुरी मेट्रो स्टेशन पर ला कर छोड़ दी जिसका कोई हमसे कोई किराया नही लिया गया। इस तरह तीन दिनों में हम लोगों ने दिल्ली से खीरगंगा की यात्रा सम्पन्न किया।

कुछ जरूरी जानकारियां…..

  1. खीरगंगा कैंप में खाने पीने के सामान बहुत ही ज्यादा महंगे हैं, इसलिए अपना बजट उस हिसाब से बना कर चले और हो सके तो साथ में कुछ रेडीमेड खाने पीने की चीज भी रख कर चलें।
  2. सुबह जल्दी निकल कर दोपहर तक खीरगंगा पहुंचने की कोशिश करें, क्योंकि जैसे-जैसे समय बीतता जाएगा, रुकने के साधन कम और किराया महंगे होते जाएंगे।
  3. उतारते समय हाथ मे पकड़ने के लिए एक डंडा जरूर साथ में रखें, इससे बैलेंस बनाने में काफी मदद मिलती है।
  4. हल्के सामान के साथ ट्रैक पर निकले क्योंकि जितना ज्यादा सामान होगा चढ़ाई में और उतराई में उतनी ही ज्यादा मुश्किल होगी।
  5. खीरगंगा में अगर आप अपना टेंट लगाना चाहते है तो आराम से लगा सकते है।

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पानी का झरना

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पानी का झरना

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ट्रेक कि ओर

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रुद्रनाग झरना

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ढाबे का रेट कार्ड

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परांठा और लेमन टी

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पानी का छोटा सा झरना

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पानी का झरना

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ट्रेक कि ओर

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पहाड़ की धार पर चढाई

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बादलो में छुपती हुई पहाड़ की चोटी

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खीरगंगा के पानी में खीर

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मन्दिर खीरगंगा का

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खीरगंगा कुंद में स्नान

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बम बम भोले

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किराये का टेंट

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हम तीनो

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मनमोहक दृश्य

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खीरगंगा का मैदान

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खीरगंगा का मैदान

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मणिकरण बस अड्डा

5 thoughts on “दिल्ली से खीरगंगा की ट्रैकिंग

  1. आपने पहले बिन फोटो ही लेख पब्लिश कर दिया था। ऐसी गडबढ न हो इसके लिए पोस्ट को पहले ही शेडयूल कर लो।
    शानदार व मजेदार ट्रैक विवरण पढने को मिला। ऐसे ही लेख पाठकों को पसन्द आते है।

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    • सही कहा भाई, वो सेव कर रहा था और पब्लिश हो गया क्योंकि मोबाइल से पहली बार पब्लिश किया है, पहले लैपटॉप से करता था तो ऐसी दिक्कत नही होती थी, आपको ये पसंद आया ये मेरे लिए सौभाग्य की बात है।

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  2. बहुत बढ़िया लगा भैया खीरगंगा ट्रेक पढ़ के😊👌👌, एक डेढ़ साल पहले गया था खीरगंगा , 4 दिन वही रुका रहा बेजड़ खूबसूरत जगह है। ब्लॉग आपने इंफॉर्मेटिव लिखा है और लोगो के मार्गदर्शन में आसानी होगी

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  3. मजा आ गया। साथी को ams वाला किस्सा भी बढ़िया था। बाकी फ़ोटो बेहद खूबसूरत है।

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